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अप्रैल 15, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजस्थानी लोकोक्तियां 10

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काकड़ी रा चोर न मुक्क की मार। शब्दार्थ :- ककड़ी की चोरी करने वाले को,केवल मुक्के के मार की ही सज़ा।  भावार्थ :- छोटे या साधारण अपराध का साधारण दंड ही दिया जाता है। करम कारी नहीं लागण दै जद के होव? भावार्थ:- भाग्य पैबन्द ही नहीं लगने दे तो क्या हो सकता है? भाग्य साथ न दे तो क्या हो सकता है? भाग्य ही साथ न दे तो प्रयत्न व्यर्थ है। (भाग्यं फलति सर्वत्र न विद्या न पौरुषम्) कदेई बड़ा दिन,कदेई बड़ी रात। शब्दार्थ :- कभी दिन बड़े होते हैं तो कभी रात बड़ी हो जाती है।  भावार्थ :- 1.संसार सदा परिवर्तनशील है, समय हमेशा एक समान नहीं रहता। 2.कभी किसी एक का दांव चल जाता है तो कभी किसी दूसरे का,हर बार किसी का समय एक जैसा नहीं रह पाता है। छ दाम को छाजलो, छै टका गंठाई का।  शब्दार्थ :-छदाम (सिक्के का एक मान जो छः दामों अर्थात् पुराने पैसे के चौथाई भाग के बराबर होता था ) का सूपड़ा लेकिन उसको बनवाने का दाम छह सिक्कों जितना।  भावार्थ :- किसी वस्तु की वास्तविक कीमत तो कम हो,परन्तु उसको उपयोग लेने लायक बनाने की कीमत कई गुना ज्यादा लगे। बगल म छोरो, गांव़ में ढींढोरौ। शब्दार्थ :- लड़का अपने पास ही हो और लडके को ढू

राजस्थानी लोकोक्तियां 9

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मन'र हरयाँ हार है, मन'र जीत्यां जीत। शब्दार्थ :- सफलता और असफलता मन पर ही निर्भर है,अगर मन से ही हार मान लें तो जीत नहीं मिल सकती है। भावार्थ :- मन में सफलता की आशा हो तो ही सफलता मिलती है और मन ही हिम्मत हार जाये तो असफलता निश्चित है। आधी छोड़ पूरी न धावे,आधी मिळे न पूरी पाव। शब्दार्थ :- आधी को छोड़कर,पूरी पाने के पीछे भागने पर,पूरी तो मिलती नहीं है लेकिन आधी भी चली जाती है। भावार्थ :- जो प्राप्त हो गयी हो ऐसी आधी चीज का संतोष न मानकर,पूरी पाने का प्रयास करता है,उसे पूरी तो मिले न मिले लेकिन मिली हुई चीज भी हाथ से चली जाती है। काणती (काणी) भेड़ को राडो (गवाड़ो) ही न्यारो। शब्दार्थ :-– कानी अर्थात जिसकी एक आँख न हो ऐसी भेड़ की बस्ती अलग होती है।  भावार्थ :-निकृष्ट व्यक्तियोँ को जब विशिष्ट लोगोँ मेँ स्थान प्राप्त नहीं हो पाता है तो,वे अपना समूह अलग ही बना लेते हैँ। टुकड़ा दे दे बछड़ा पाल्या, सींग आया जद मारण आया। शब्दार्थ :- बछड़े को पाल-पोष कर बड़ा किया, लेकीन बड़ा हो जाने पर मारने का प्रयास करने लग गया  भावार्थ :-जिनको प्रयास कर आगे बढ़ाया,वो ही बड़े हो जाने पर पालक को ही क्षति पहुचने ल

राजस्थानी लोकोक्तियां 8

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ब्यांह बिगाड़े दो जणा, के मूंजी के मेह ,बो धेलो खरचे नई, वो दडादड देय। शब्दार्थ :-विवाह को दो बातें ही बिगाड़ती है, कंजूस के कम पैसा खर्च करने से और बरसात के जोरदार पानी बरसा देने से। भावार्थ :-काम को सुव्यवस्थित करने के लिए उचित खर्च करना जरुरी होता है,वहीँ प्रकृति का सहयोग भी आवश्यक है। म गाऊँ दिवाळी'का, तूं गाव़ै होळी'का।  शब्दार्थ :- मैं दिवाली के गीत गाता हूँ और तू होली के गीत गाता है।  भावार्थ:- मैं यहाँ किसी प्रसंग विशेष पर चर्चा कर रहा हूँ और तुम असंबद्ध बात कर रहे हो। म्है भी राणी, तू भी राणी, कुण घालै चूल्हे में छाणी? शब्दार्थ :- मैं भी रानी हूँ और तू भी रानी है तो फिर चूल्हे को जलाने के लिए उसमें कंडा/उपला कौन डाले? भावार्थ :- अहम या घमण्ड के कारण कोई भी व्यक्ति अल्प महत्व का कार्य नहीं करना चाहता है। मढी सांकड़ी,मोडा घणा। शब्दार्थ:-मठ छोटा है और साधु बहुत ज्यादा हैं। (मोडा =मुंडित, साधु) भवार्थ:- जगह/वस्तु अल्प मात्रा में है,परन्तु जगह/वस्तु के परिपेक्ष में उसके हिस्सेदार ज्यादा हैं। आप की गरज, गधै न बाप कहाव। शब्दार्थ:-अपनी जरुरत/अपना हित गधे को बाप कहलवाती है। भावार

राजस्थानी लोकोक्तियां 7

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  कदै घी घणा,कदै मुट्ठी चणा।            शब्दार्थ :- कभी बहुत अधिक घी प्राप्त मिल गया और कभी केवल एक मुट्ठी चने ही मिले। भावार्थ :- किसी वस्तू या परिस्तिथि की कभी बहुतायत होना और कभी अत्यंत कमी या न्यूनता होना। न जाण,न पिछाण, हूँ लाडा की भुवा। शब्दार्थ :- न जान, न पहचान, मैं वर की भुआ भावार्थ :- किसी बात की गहराई को जाने बिना अपना मत रखना और उसे मनवाने की जिद्द करना। मांग्या मिल र माल, जकांर के कमी र लाल। शब्दार्थ :- जिनको मांगने से ही धन मिल जाता है,उनको किसी चीज़ की क्या कमी हो सकती है। भावार्थ :-ऐसे लोग जिनको अपना गुजारा/काम ही मांग-तांग कर चलाना होता है,उनको क्या परेशानी हो सकती है ? परन्तु जिनका उद्देश्य परिश्रम से ही सफलता हांसिल करना होता है,उनको कष्ट तो सहन करना ही पड़ता है।  ठाया-ठाया न टोपली,बाकी न लंगोट।  शब्दार्थ :- कुछ चुने हुए लोगों को टोपी दी गयी परन्तु शेष लोगों को सिर्फ लंगोट ही मिली ।  भावार्थ :- कुछ विशेष चयनित लोगों का तो यथोचित सम्मान किया गया परन्तु शेष लोगों को जैसे-तैसे ही निपटा दिया गया, कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को कर लिया परन्तु सामान्य कार्यों की उपेक्षा कर दी गय

राजस्थानी लोकोक्तियां 6

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बकरी के मूंढा में मतीरो कुण खटण दे। शब्दार्थ :-बकरी के मुहँ में तरबूज कौन रहने देता है ? भावार्थ :- कमजोर / असहाय व्यक्ति को प्रभुत्वशाली और सक्षम लोग लाभ नहीं उठाने देते हैं। पागड़ी गयी आगड़ी, सिर सलामत चायीज। शब्दार्थ :- पगड़ी रहे न रहे सिर की सलामती ज्यादा जरुरी है।  भावार्थ :- स्वार्थ की सिद्धि होती हो तो लोक-लाज की परवाह या मर्यादा की चिंता नहीं।  करमहीन किसनियो, जान कठ सूं जाय । करमां लिखी खीचड़ी, घी कठ सूं खाय ।।  शब्दार्थ :- भाग्यहीन किसन नामक व्यक्ति किसी विवाह समारोह में शामिल नहीं हो सकता है। उसके भाग्य में तो खिचड़ी खाना लिखा है वो घी कहाँ खा पायेगा।  भावार्थ :- भाग्य में जितना फल प्राप्त होना तय है,किसी को उससे अधिक प्राप्त नहीं होता है। घर तो घोस्यां का बळसी, पण सुख ऊंदरा भी कोनी पाव।  शब्दार्थ :- अगर घोसीयों के घर जलेंगे तो उनकी हानि तो अवश्य होगी परन्तु वहां रहने वाले चूहे भी सुखी नहीं रहेंगे। ( घोसी = एक मुस्लिम जाति,जो की पशु पालन और दूध का व्यवसाय करते हैं.) भावार्थ :-किसी व्यक्ति या संस्थान को अगर हानि होती है तो उन पर निर्भर अन्य लोगों को भी मुसीबतों को सहन करना पड़ता

राजस्थानी लोकोक्तियां 5

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मामैरो ब्यांव़,माँ पुुरसगारी, जीमो बेटा रात अंधारी। शब्दार्थ :- मामा का विवाह,माँ भोजन परोसनेवाली और अंधेरी रात है, तो बस फिर और क्या चाहिए,बेटा भरपेट खाना खाओ। भावार्थ :- जिस चीज की आपको आवश्यकता हो,उसे देने वाला ही आपका कोई नजदीकी हो, समय और परिस्तिथियाँ भी अनुकूल हों तो फिर मनचाहा काम होना ही है। थाळी फूट्यां ठीकरो ई हाथ में आया कर। शब्दार्थ :-थाली टूट जाने पर उसका ठीकरा (टुकड़ा )ही हाथ लगता है। भावार्थ :- अच्छी वस्तु/आपसी तालमेल में व्यवधान आने से या टूटने के परिणाम स्वरुप अंततः सभी हिस्सेदारों के हाथ उसका छोटा या कम उपयोगी भाग ही आता है। पांचूं आंगळयां एकसी कोनी होव। शब्दार्थ :-आकार-प्रकार में पांचों उंगलियां एक समान नहीं होती है।  भावार्थ :- सब आदमी या सब चीजें बराबर नहीं होती हैं,गुण-दोषों के आधार पर प्रकृति ने भी सबको अलग-अलग बनाया है,परन्तु कोई भी आदमी या चीज अनुपयोगी नहीं है। काम करे ऊधोदास, जीम जावे माधोदास। शब्दार्थ :- ऊधोदास काम करता है, और माधोदास खा जाता है। भावार्थ :- कोई एक व्यक्ति की मेहनत से किये हुए काम का श्रेय कोई दूसरा व्यक्ति ले लेता है। थोथो शंख पराई फूँक स्यू ब

हनुमान जी की पूजा करते समय रखें ध्यान। हनुमान जयंती कहूं ? या हनुमान जन्मोत्सव ?

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हनुमान जन्मोत्सव चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। हनुमान, जिन्हें वानर भगवान के रूप में भी जाना जाता है, इस दिन उनका जन्म हुआ था। हनुमान जी के जन्म दिवस को हनुमान जयंतीह नहीं, जन्मोत्सव के रूप में मनाना चाहिए। भक्तगण अपनी स्थानीय मान्यताओं एवं कैलेण्डर के आधार पर वर्ष में भिन्न-भिन्न समय पर हनुमान जन्मोत्सव का त्यौहार मनाते हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में चैत्र पूर्णिमा की हनुमान जयन्ती सर्वाधिक लोकप्रिय है। हनुमान जयन्ती शनिवार, अप्रैल 16, 2022 को पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - अप्रैल 16, 2022 को 02:25 AM बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त - अप्रैल 17, 2022 को 12:24 AM बजे हनुमान जन्मोत्सव को जयंती ना कहें। जयंती और जन्‍मोत्‍सव शब्‍द के इस बड़े मूलभूत अंतर को देखते हुए भगवान हनुमान के जन्‍म के पर्व के लिए जन्‍मोत्‍सव शब्‍द का ही इस्‍तेमाल करें, साथ ही अन्‍य लोगों को भी सही शब्‍द कहने के लिए ही प्रेरित करें, इसके अलावा अपने शुभकामना संदेशों में भी हनुमान जन्‍मोत्‍सव का ही इस्‍तेमाल करें।   हनुमान जन्मोत्सव क्यों कहें ?  अपने माता पिता, भाई बहन, मित्र और परिचितों का हम जन्मदिन मनाते हैं, जब कोई मह

राजस्थानी लोकोक्तियां 4

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कथनी स्यु करणी दोरी। शब्दार्थ :- कहना आसान है जबकि काम करना दुस्कर होता है।  भावार्थ :- किसी काम की बात को कहना आसान है,क्योंकि बात को कहने में किसी प्रकार का श्रम नहीं लगता है,जबकि काम को करना अपेक्षाकृत दुस्कर होता है,क्योंकि किसी कार्य करने के लिए कार्य योजना,श्रम एवं धन लगता है। चातर की च्यार घड़ी, मूरख को जमारो। शब्दार्थ :- चतुर व्यक्ति के लिए चार घड़ी (थोड़ा सा समय ) ही काफी है जबकि मूर्ख का पूरा जीवन भी कम पड़ जाता है।  भावार्थ :- चतुर थोड़े समय ही में जिस काम को कर लेता है,मुर्ख व्यक्ति उसको उम्र भर नहीं कर सकाता। थूक सूं गांठयोड़ा,कितना दिन चले? शब्दार्थ :- थूक से चिपकाये हुए कितने दिन तक जुड़े हुए रह सकते हैं ? भावार्थ :- तात्कालिक जल्दी से किया हुआ कार्य अधिक समय के लिए टिकाऊ नहीं हो सकता है। धीरां का गांव बसै,उतावळां का देवळयां होव। शब्दार्थ :-धैर्यशाली लोगों के नाम से गांव बस जाते हैं जबकि उतावली करने वालों के सिर्फ स्मारक बनाते हैं।  शीघ्रता से युद्ध में उतरने वाले के केवल स्मारक ही रहते हैं और धैय्र्य वाला  और युद्ध चातुय्र्य वाले पुरुष गांव बसा सकते है। भावार्थ :- धैर्य औए

राजस्थानी लोकोक्तियां 3

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न खुदा ही मिला न विसाले सनम। खाट पड़े ले लीजिये , पीछै देवै न खील आं तीन्यां का एक गुण , बेस्यां बैद उकील।। अर्थ - वैश्या अपने ग्राहक से और वैद्य अपने रोगी से खाट पर पड़े हुए ही जो लेले सो ठीक है, पीछे मिलने की उम्मीद न करे। …इसी प्रकार वकील अपने मुवक्किल से जितना पहले हथिया ले वही उसका है। जीवते की दो रोटी , मरोड्ये की सो रोटी। अर्थ - जीते हुए की सिर्फ दो रोटी और मरे हुए की सौ रोटियाँ लगती है।  क मोड्यो बाँध पाग्ड़ी क रहव उघाड़ी टाट।  बाबाजी बांधे तो सिर पर पगड़ी ही बांधे नहीं तो नंगे सिर ही रहे। कुम्हार गधे चढले , 'क कोनी चढू , पण फेर आपै ई चढले। जो मनुष्य बार बार कहने पर भी किसी काम को न करे , लेकिन फिर झख मार कर अपने आप करले। दांतले खसम को रोवते को बेरो पड़े ना हँसते को। अर्थ - दंतुले [जिसके दांत बाहर दिखते हो] पति का कुछ पता नहीं चलता कि वह रो रहा है या हँस रहा है।  प रनारी पैनी छुरी , तीन ठोर से खाय  धन छीजे जोबन हडे , पत पञ्चां में जाय। अर्थ - परनारी से प्रेम करना पैनी छुरी के समान है, वह धन और यौवन का हरण करती है और पंचो में प्रतिष्ठा गवां देती है। दूर जंवाई फूल बरोबर , गाँव जं

राजस्थानी लोकोक्तियां, मुहावरे। 2

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उछाल भाठो करम में क्यूँ लेणो ? शब्दार्थ :- पत्थर को उछाल कर उसे अपने सर पर क्यूँ लेना ? भावार्थ :- आफत को स्वयं अपनी ओर से सिर पर नहीं लेना चाहिये। कमाव तो वर, नहीं तो माटी रो ही ढल ! शब्दार्थ :-कमाई करता है तो पति है,नहीं तो मिटटी के ढेले के सामान है।  भावार्थ :- धन-अर्जन करता है या कमाई करता है तो पति कहलाने के लायक है,नहीं तो वह मिटटी के ढेले के सामान है। माटी की भींत डिंगती बार कोनी लगाव। शब्दार्थ :- मिट्टी से बनाई हुई दिवार गिरने में ज्यादा समय नहीं लगाती है । भावार्थ :- आधे-अधुरे मन से या अपुष्ट संसाधनो से किया हुआ कार्य नष्ट होते देर नहीं लगती है । विणज किया था जाट ने सौ का रहग्या तीस। शब्दार्थ :- जाट ने सौ रूपया का मूल धन लगा कर व्यापर आरम्भ किया था,पर उसे व्यापर में हानि हुई और उसका सौ रूपया घट कर मात्र तीस रूपया रह गया।  भावार्थ :- कार्य वही करना चाहिए जिस के बारे में ज्ञान हो क्योंकि अपूर्ण ज्ञान से किया हुआ कार्य लाभ के स्थान पर हानि पहुंचाता है। पाड़ोसी के बरससी तो छांटा तो अठई पड़सी  शब्दार्थ :- पड़ोसियों के यहाँ बारिश होगी तो कुछ बुंदे तो हमारे घर पर भी गिरेगी ! भावार्थ :-