राजस्थानी लोकोक्तियां 9


 मन'रै हरयाँ हार है, मन'रै जीत्यां जीत।

शब्दार्थ :- सफलता और असफलता मन पर ही निर्भर है,अगर मन से ही हार मान लें तो जीत नहीं मिल सकती है ।

भावार्थ :- मन में सफलता की आशा हो तो ही सफलता मिलती है और मन ही हिम्मत हार जाये तो असफलता निश्चित है।

आधी छोड़ पूरी नै धावे,आधी मिळे न पूरी पावै।

शब्दार्थ :- आधी को छोड़कर,पूरी पाने के पीछे भागने पर,पूरी तो मिलती नहीं है लेकिन आधी भी चली जाती है। 

भावार्थ :- जो प्राप्त हो गयी हो ऐसी आधी चीज का संतोष न मानकर,पूरी पाने का प्रयास करता है,उसे पूरी तो मिले न मिले लेकिन मिली हुई चीज भी हाथ से चली जाती है।

काणती (काणी) भेड़ को राडो (गवाड़ो) ही न्यारो।

शब्दार्थ :-– कानी अर्थात जिसकी एक आँख न हो ऐसी भेड़ की बस्ती अलग होती है। 

भावार्थ :-निकृष्ट व्यक्तियोँ को जब विशिष्ट लोगोँ मेँ स्थान प्राप्त नहीं हो पाता है तो,वे अपना समूह अलग ही बना लेते हैँ।

टुकड़ा दे दे बछड़ा पाल्या, सींग आया जद मारण आया।

शब्दार्थ :- बछड़े को पाल-पोष कर बड़ा किया, लेकीन बड़ा हो जाने पर मारने का प्रयास करने लग गया 

भावार्थ :-जिनको प्रयास कर आगे बढ़ाया,वो ही बड़े हो जाने पर पालक को ही क्षति पहुचने लग गए।

धापी थारी छाछ सूं, कुत्ता सूं छुड़ाव।

शब्दार्थ :-तेरी छाछ से तौबा, मुझे तेरे कुत्तों से छुड़ा दे।

भावार्थ :- दूसरे से अपना काम निकलवाने गए,परन्तु वहाँ तो उल्टी मुसीबत गले में पड़ गयी।

आज री थेप्योड़ी आज कौनी बळे।

सब्दार्थ:- आज के पाथे हुए ( गोबर की थेपडी ) कंडे आज नही जलते|

भावार्थ :- कोई भी कार्य को होने में कुछ समय लगता है, जिसके लिए धीरज रखने की आवश्यकता होती है।

एक आँख किसी खोले अर किसी मींचे।

शब्दार्थ :- अगर किसी की एक ही आँख होतो कौनसी आँख को खोलो और कौनसी आँख को बंद कर दे।

भावार्थ :- अगर किसी के पास कोई चीज़ या रास्ता चुनने का विक्लप ही न हो तो मज़बूरी वश उसे एक ही रास्ता चुनना पड़ता है ।
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