राजस्थानी लोकोक्तियां 8


ब्यांव बिगाड़े दो जणा, के मूंजी के मेह ,बो धेलो खरचे नई, वो दडादड देय।

शब्दार्थ :-विवाह को दो बातें ही बिगाड़ती है, कंजूस के कम पैसा खर्च करने से और बरसात के जोरदार पानी बरसा देने से।

भावार्थ :-काम को सुव्यवस्थित करने के लिए उचित खर्च करना जरुरी होता है,वहीँ प्रकृति का सहयोग भी आवश्यक है।

म गाऊँ दिवाळी'रा, तूं गाव़ै होळी'रा। 

शब्दार्थ :- मैं दिवाली के गीत गाता हूँ और तू होली के गीत गाता है। 

भावार्थ:- मैं यहाँ किसी प्रसंग विशेष पर चर्चा कर रहा हूँ और तुम असंबद्ध बात कर रहे हो।

म्है भी राणी, तू भी राणी, कुण घालै चूल्हे में छाणी?

शब्दार्थ :- मैं भी रानी हूँ और तू भी रानी है तो फिर चूल्हे को जलाने के लिए उसमें कंडा/उपला कौन डाले?

भावार्थ :- अहम या घमण्ड के कारण कोई भी व्यक्ति अल्प महत्व का कार्य नहीं करना चाहता है।

मढी सांकड़ी,मोडा घणा।

शब्दार्थ:-मठ छोटा है और साधु बहुत ज्यादा हैं। (मोडा =मुंडित, साधु)

भवार्थ:- जगह/वस्तु अल्प मात्रा में है,परन्तु जगह/वस्तु के परिपेक्ष में उसके हिस्सेदार ज्यादा हैं।

आप री गरज गधै नेै बाप कहवावै।

शब्दार्थ:-अपनी जरुरत/अपना हित गधे को बाप कहलवाती है।

भावार्थ :-स्वार्थसिद्धि के लिए अयोग्य/ कमतर व्यक्तित्व वाले आदमी की भी खुशामद करनी पड़ती है।

चिड़ा-चिड़ी री कई लड़ाई, चाल चिड़ा मैँ थारे लारे आई।

 शब्दार्थ:-चिड़िया व चिड़े की कैसी लड़ाई,चल चिड़ा मैं तेरे पीछे आती हूँ।

 भावार्थ :- पति-पत्नी के बीच का मनमुटाव क्षणिक होता है।

चाए जित्ता पाळो, पाँख उगता ईँ उड़ ज्यासी। 

शब्दार्थ:-पक्षी के बच्चे को कितने ही लाड़–प्यार से रखो,वह पंख लगते ही उड़ जाता है। 

भावार्थ :- हर जीव या वस्तु उचित समय आने पर अपनी प्रकृति के अनुसार आचरण अवश्य करते ही हैं।

पड़ै पासो तो जीतै गंव़ार।

शब्दार्थ :- पासा अनुकूल पड़े,तो गंवार भी जीत जाता है,(चौसर के खेल में सब कुछ दमदार पासा पड़ने पर निर्भर करता है,उसमें और अधिक चतुराई की आवश्यकता नहीं होती है)

भावार्थ:- भाग्य अनुकूल हो तो अल्प बुद्धि वाला भी काम बना लेता है, नहीं तो अक्लमंद की भी कुछ नहीं चलती।

नागां री नव पांती, सैंणा री एक।

शब्दार्थ :- उदण्ड/स्वछन्द व्यक्ति को किसी चीज के बंटवारे में नौ हिस्से चाहिए।

भावार्थ:- उदण्ड/स्वछन्द व्यक्ति किसी साझा हिस्से वाली चीज़ या संपत्ति में से अनुचित हिस्सेदारी लेना चाहता है जबकि सज्जन व्यक्ति अपने हक़ के ही हिस्से से ही संतुष्ठ रहता है।

कार्तिक की छांट बुरी, बाणिये की नाट बुरी।

भाँया की आंट बुरी, राजा की डांट बुरी।। 

अर्थ - कार्तिक महीने की वर्षा बुरी , बनिए की मनाही , भाइयों की अनबन बुरी और राजा की डांट-डपट बुरी।       ⬅️पीछे और पढ़ें🇮🇳आगे और पढ़ें ➡️


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