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राजस्थानी लोकोक्तियां 5

मामैरो ब्यांव़,माँ पुुरसगारी, जीमो बेटा रात अंधारी।

शब्दार्थ :- मामा का विवाह,माँ भोजन परोसनेवाली और अंधेरी रात है, तो बस फिर और क्या चाहिए,बेटा भरपेट खाना खाओ।

भावार्थ :- जिस चीज की आपको आवश्यकता हो,उसे देने वाला ही आपका कोई नजदीकी हो, समय और परिस्तिथियाँ भी अनुकूल हों तो फिर मनचाहा काम होना ही है।

थाळी फूट्यां ठीकरो ई हाथ में आया कर।

शब्दार्थ :-थाली टूट जाने पर उसका ठीकरा (टुकड़ा )ही हाथ लगता है।

भावार्थ :- अच्छी वस्तु/आपसी तालमेल में व्यवधान आने से या टूटने के परिणाम स्वरुप अंततः सभी हिस्सेदारों के हाथ उसका छोटा या कम उपयोगी भाग ही आता है।

पांचूं आंगळयां एकसी कोनी होव।

शब्दार्थ :-आकार-प्रकार में पांचों उंगलियां एक समान नहीं होती है। 

भावार्थ :- सब आदमी या सब चीजें बराबर नहीं होती हैं,गुण-दोषों के आधार पर प्रकृति ने भी सबको अलग-अलग बनाया है,परन्तु कोई भी आदमी या चीज अनुपयोगी नहीं है।

काम करे ऊधोदास, जीम जावे माधोदास।

शब्दार्थ :- ऊधोदास काम करता है, और माधोदास खा जाता है।

भावार्थ :- कोई एक व्यक्ति की मेहनत से किये हुए काम का श्रेय कोई दूसरा व्यक्ति ले लेता है।

थोथो शंख पराई फूँक स्यू बाज।

शब्दार्थ :- खोखला शंख किसी के द्वारा फूँक मारने से ही बजता है। 

भावार्थ :- जिस व्यक्ति मेँ स्वयं मेँ कोई गुण नहीँ होता है,वह दूसरोँ का अनुसरण ही करता है स्वयं कोई निर्णय नहीं कर पाता है।

क पूरो ज्ञानी भलो,क तो भलो अनजाण। मूढमति अधवीच को जळ म जिसों पखाण।। 

शब्दार्थ :- या तो व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी अच्छा होता है या फिर पूरा अज्ञानी ही ठीक होता है। अपूर्ण ज्ञान या अपूर्ण जानकारी वाला तो जैसे पानी में पड़ा हुआ पथ्थर सामान होता है। 

भावार्थ :-आधा-अधूरा ज्ञान या जानकारी ज्ञान ता से ज्यादा नुकसानप्रद हो सकता है।

पईसारी हांडी पण बजार लेव।

शब्दार्थ :-पैसे की हांड़ी ( एक पैसे की / काम मूल्य की ) भी बजाकर लेते हैं।

भावार्थ :- चाहे थोड़े मोल का ही मालखरीदना हो पर उसको खूब देखभाल कर ही लेना चाहिए / लेते हैं। छोटे काम को भी खूब विचारपूर्वक करना चाहिए।

दिन फिर जद चतराई चूल्हे में जाय पड़ी।                               
शब्दार्थ :- जब दिन बदल जाते हैं तो चतुराई चूल्हे में जा पड़ती है।                                                             
भावार्थ :- जब किसी का समय बुरा चल रहा होता है तो वेसे में चतुराई से भी काम नहीं बन पाता है ।

घर रा छोरा घट्टी चाटे, पाडौसी ने आटो।

शब्दार्थ :- घर के बच्चे तो खाने के लिए तरस रहे हैं,परन्तु पड़ौसी को भोजन या आटा दिया जा रहा है।

भावार्थ :- झूठी शान या अपना नाम या प्रसिद्धि के लिए अपनी क्षमता से अधिक खर्च करना / स्वयं का नुकसान करते हुए भी दूसरों का लाभ करना जिससे की अपना नाम हो।

घी घल्योड़ो तो अँधेरा म भी छानों कोनी रव।               

शब्दार्थ :- भोजन में अगर घी डाला हो तो,नहीं बताने पर भी छुपा नहीं रहता है ।                                       
भावार्थ :- किसी की भलाई का काम या कोई अच्छा किया हुआ काम प्रसिद्धी का मोहताज़ नहीं होता है,वो सामने आ ही जाता है।

संगत बड़ा की कीजिये, बढत बढत बढ जाए।

बकरी हाथी पर चढी , चुग चुग कॊंपळ खाए।।

शब्दार्थ :-भावार्थ :-संगति हमेशा बड़ो की करनी चाहिए, जिससे उत्तरोत्तर वृद्धि हो जाती है। बकरी ने हाथी से संगति की तो हाथी ने उसे अपनी पीठ पर बैठा लिया और अब वह चुन-चुन कर ऊँचे वृक्षों की हरी कोपले खा रही है। 

भावार्थ :- संगति हमेशा बड़ो की,समृद्ध लोगों प्रभावशाली लोगों की करनी चाहिए। जिससे कि उनके अनुभव और ज्ञान से स्वयं को लाभ हाँसिल हो सकता है।

सत मत छोड़ो हे नराँ,सत छोड़्याँ पत जाय। 

सत की बाँधी लिच्छमी फेर मिलेगी आय।।

शब्दार्थ :-सत्य का साथ मत छोडो ,सत्य का साथ छोड़ देने से सम्मान चला जाता है। अगर किसी कारण वश लक्ष्मी / वैभव कम हो गया हो तब भी सत्य की राह चलने से पुनः प्राप्त हो जाएगी। 

रूपलालजी गुरू, बाकी सब चेला।

शब्दार्थ :-रुपया गुरु है, बाकी सब चेले हैं।

 भावार्थ :- रुपया सबसे बड़ा है।

घर री खांड किरकरी लागै, चोरी रो गुड़ मीठो।

शब्दार्थ :-घर की खांड़/शक्कर करकरी लगती है, चोरी का गुड़ मीठा लगता है।.

भावार्थ :- स्वयं की स्वामित्व की वस्तु का तिरस्कार करके मुफ्त की वस्तु पर आंस लगाना।

झुकतै चेळा रा स सीरी।

शब्दार्थ :- तराजू के पल्ले में से झुकते हुए पल्ले में सब भागीदारी चाहते हैं। 

भावार्थ :-अपने मतलब या स्वार्थ सिद्धि हेतु हर कोई उसी तरफ हो जाता है जिस तरफ अधिक फायदा होता है।

कात्यो पींज्यो कपास होगो।

शब्दार्थ :- काता हुआ धागा और धुनी हुई रूई,सारी फिर कपास हो गई !

भावार्थ :-मेहनत कर के किसी कार्य को पूर्ण किया पर किसी कारण से पूरा काम नष्ट हो गया।

कह्याँ किसो कूवे में पड़ीज के।

शब्दार्थ :-किसी के कहने मात्र से कौन सा कूवे में गिर जाता है।

भावार्थ :- किसी की सलाह मात्र से कोई ऐसा कार्य नहीं किया जाता है कि जिसमें हानि निश्चित हो।

कुम्हार कुम्हारी ने तो कोनी जीतै, गधैड़ै का कान मरोड़ै।

शब्दार्थ :-किसि बात पर बहस में कुम्हार अपनी पत्नी से जीत नहीं पता है तो अपने गधे का कान एंठ देता है। 

भावार्थ :- किसी चर्चा या बहस में अपनी बात नहीं मनवा सकने पर उसकी खीज़ किसी निर्बल या असहाय पर निकलना।

बळयोड़ी बाटी, उथळीज कोनी। 

शब्दार्थ :- जली हुई रोटी को भी नहीं पलटा जा सकता है। 

भावार्थ :- आलस्य या कामचोरी के कारण सामने दिखाई देती हुए हानि को भी नहीं रोक सकते हैं ।

गंडक र भरोस गाडो कोनी चाल। 

शब्दार्थ :- कुत्ते की जिम्मेदारी पर गाड़ी नहीं चल सकती है। 

भावार्थ :- असक्षम या साधन विहीन लोगों या संस्थान की जिम्मेदारी पर महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपा जा सकता है।

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