राजस्थानी लोकोक्तियां, मुहावरे। 2

 
 उछाल भाठो करम में क्यूँ लेणो ?

शब्दार्थ :- पत्थर को उछाल कर उसे अपने सर पर क्यूँ लेना ?

भावार्थ :- आफत को स्वयं अपनी ओर से सिर पर नहीं लेना चाहिये।

कमावै तो वर, नहीं जणै माटी रो ही ढल !

शब्दार्थ :-कमाई करता है तो पति है,नहीं तो मिटटी के ढेले के सामान है। 

भावार्थ :- धन-अर्जन करता है या कमाई करता है तो पति कहलाने के लायक है,नहीं तो वह मिटटी के ढेले के सामान है।

माटी की भींत डिंगती बार कोनी लगाव !

शब्दार्थ :- मिट्टी से बनाई हुई दिवार गिरने में ज्यादा समय नहीं लगाती है ।

भावार्थ :- आधे-अधुरे मन से या अपुष्ट संसाधनो से किया हुआ कार्य नष्ट होते देर नहीं लगती है ।

विणज किया था जाट ने सौ का रहग्या तीस !

शब्दार्थ :- जाट ने सौ रूपया का मूल धन लगा कर व्यापर आरम्भ किया था,पर उसे व्यापर में हानि हुई और उसका सौ रूपया घट कर मात्र तीस रूपया रह गया। 

भावार्थ :- कार्य वही करना चाहिए जिस के बारे में ज्ञान हो क्योंकि अपूर्ण ज्ञान से किया हुआ कार्य लाभ के स्थान पर हानि पहुंचाता है।

पाड़ोसी के बरससी तो छांटा तो अठैई पड़सी                          शब्दार्थ :- पड़ोसियों के यहाँ बारिश होगी तो कुछ बुंदे तो हमारे घर पर भी गिरेगी !

भावार्थ :- अगर हमारे पड़ोसियों के यहाँ सम्पन्नता होगी, उसका कुछ लाभ तो हमें भी प्राप्त होगा ।

हाथ ई बाळया, होळा ई हाथ कोन आया !

शब्दार्थ :- होले (गीले हरे चने) को भुनने का प्रयास किया,पर उस प्रयास में हाथ जल गए। 

भावार्थ :- मेहनत की,कष्ट भी सहा, लेकिन प्रतिफल स्वरुप लाभ के स्थान पर हानि हुई।  

जिस्या ने विस्या ही मिळ्या,ज्यां बामण नै नाई। बो दिवी आसकां, बो आरसी दिखाई॥ 

शब्दार्थ :- एक प्रकार के आचार-व्यहवार वाले को उसी के जैसा मिल गया, जैसे की ब्राह्मण को नाई। एक अगर आसकां (हवन की राख) देता है, तो दुसरा कांच दिखा देता है ।

भावार्थ :- जैसे को तेसा ही मिलता है, कोई काम करवाने के बदले अगर एक कुछ नहीं देता है, दुसरा भी काम मुफ्त में करवा लेता है ।

मिनख कमावै च्यार पहर, ब्याज कमावै आठ पहर । 

शब्दार्थ :- व्यक्ति काम कर के एक दिन में चार प्रहर (लगभग आधा दिन) कमाता है,जबकि ब्याज का चक्र पुरे समय चलता रहता है।             

भावार्थ :-व्यक्ति के एक दिन में काम करने की एक सीमा होती है,जबकि ब्याज का कुचक्र हर समय चलता रहता है,अतः जब तक हो सके ब्याज को लेकर सतर्क रहना चाहिए।

रोयां राबड़ी कुण घाल !

शब्दार्थ :- रोने मात्र से राबड़ी कौन खिलाता है ?

भावार्थ :- परिश्रम से सफलता प्राप्त होती है, लक्षय मात्र चिंता करने से या मांगने से प्राप्त नहीं हो सकता है।

मतलब री मनुहार जगत जिमावै चूरमा !

शब्दार्थ :- स्वार्थ साधने के लिए मनुहार करके यह संसार भोजन/व्यंजन खिलाता है। 

भावार्थ :- स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ लोग अपने स्वाभिमान को नजर अंदाज़ करते हुए किसी की चापलूसी करने लगते हैं।                          ⬅️पीछे देखें🇮🇳आगे और पढ़ें➡️


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