राजस्थानी लोकोक्तियां 13

 

 अगम् बुद्धी बाणियो पिच्छम् बुद्धी जाट । तुर्त बुद्धी तुरकड़ो, बामण सपनपाट ।।    अर्थ - बनिया घटना के आगे की सोचता है, जाट बादमें सोचता है, मुसलमान तुरंत निर्णय लेता है, परन्तु ब्राह्मण तो कुछ सोचता ही नहीं है |                        अंधा की माखी राम उड़ाव।

 अर्थ-बेसहारे व्यक्ति का साथ भगवान देता है। 

अकल बिना ऊंट उभाणा फिरी। 

अर्थ-मूर्ख व्यक्ति साधन होते हुए भी उनका उपयोग नहीँ कर पाते।

अक्कल उधारी कोनी मिल्ल। 

अर्थ-बुद्धि उधार में प्राप्त नहीं होती। 

अक्कल कोई कै बाप की कोनी। 

अर्थ-बुद्धि पर किसी का सर्वाधिकार नहीं है |

अगस्त आगा, मेह पूगा। 

अर्थ-अगस्त माह शुरू होते ही वर्षा पहुँच जाती है |

अणदेखी नै देख, बीनै गति न मोख। 

अर्थ-निर्दोष पर दोष लगाने वाले की कहीँ गति नहीँ होती।

अणमांग्या मोती मिलै, मांगी मिलै न भीख। 

अर्थ-बिना मांगे कीमती चीज मिल जाती है, पर मांगने पर भीख भी नहीं मिलती है। 

अत पितवालो आदमी, सोए निद्रा घोर।

 अण पढ़िया आतम कही, मेघ आवै अति घोर।।

अर्थ-अधिक पित्त प्रकृति का व्यक्ति यदि दिन मेँ भी अधिक सोए तो यह भारी वर्षा का सूचक है।

अदपढ़ी विद्या, होव चिन्त्या, धुवे सरीर। 

अर्थ-अधूरे ज्ञान से चिंता बढती है, और शरीर कमजोर होता है 

अनहोणी होणी नहीं, होणी होय सो होय। 

अर्थ-जो नहीं होना है वह होगा नहीं और होने को टाल नहीं सकते है।

अम्बर क थेगळी कोनी लागै । 

अर्थ-आकाश में पैच नहीं लगाया जा सकता।

अम्बर राच्यो, मेह माच्यो।

अर्थ-आसमान का लाल होना वर्षा का सूचक है।

अम्मर को तारो हाथ सै कोनी टूट। 

अर्थ-आकाश का तारा हाथ से नहीँ टूटता।

अम्मर पीळो में सीळो । 

अर्थ-आसमान का पीला होना वर्षा का सूचक है।

अरजन जसा ही फरजन । 

अर्थ-सब एक जैसे हैं।

अरड़ावतां ऊँट लदै।

अर्थ-दीन पुकार पर भी ध्यान न देना।

असो भुगानियो भोलो कोनी जको भूखो भैसां में जाय। 

अर्थ-कोई मूर्ख होगा जो प्रतिफल की इच्छा के बगैर कार्य करे।

आँ तिलां मैँ तेल कोनी। 

अर्थ-क्षमता का अभाव।

आँख मीच्यां अंधेरो होय। 

अर्थ-ध्यान न देने पर अहसास का न होना।

आँखन, कान, मोती, करम, ढोल, बोल अर नार। 

अ तो फूट्या ना भला, ढाल, ताल, तलवार॥ 

अर्थ-ये सभी चीजेँ न ही टूटे-फूटे तो ही अच्छा है।

आंख्याँ देखी परसराम, कदे न झूठी होय । 

अर्थ-आँखोँ देखी घटना कभी झूँठी नहीँ होती।

आंधा मेँ काणोँ राव| 

अर्थ-मूर्खोँ मेँ कम गुणी व्यक्ति का भी आदर होता है।

आगे थारो पीछे म्हारो। 

अर्थ-जैसा आप करेँगे वैसा ही हम।

आज मरयो दिन दूसरो। 

अर्थ-जो हुआ सो हुआ।

आज हमां और काल थमां। 

अर्थ-जो आज हम भुगत रहे हैँ, कल तुम भुगतोगे।

आडा आया माँ का जाया। 

अर्थ-कठिनाई मेँ सगे सम्बन्धी (भाई) सहायता करते हैँ।

आडू चाल्या हाट, न ताखड़ी न बाट। 

अर्थ-मूर्ख का कार्य अव्यवस्थित होना।

आदै थाणी न्याय होय। 

अर्थ-बुरे/बेईमान को फल मिलता है।

आप कमाडा कामडा, दई न दीजे दोस। 

अर्थ-व्यक्ति के किये गए कर्मोँ के लिए ईश्वर को दोष नहीँ देना चाहिए।

आप गुरुजी कातरा मारै, चेला नै परमोद सिखावै। 

अर्थ-निठल्ले गुरुजी का शिष्योँ को उपदेश देना।

आप मरयां बिना सुरग कठै। 

अर्थ-काम स्वयं ही करना पड़ता है।

आम खाणा क पेड़ गिणना। 

अर्थ-मतलब से मतलब रखना।

आषाढ़ की पूनम, निरमल उगै चांद। 

कोई सिँध कोई मालवे जायां कट सी फंद। 

अर्थ-आषाढ़ की पूर्णिमा को चाँद के साथ बादल न होने पर अकाल की शंका व्यक्त की जाती है।

इब ताणी तो बेटी बाप कै ही है।

अर्थ-अभी कुछ नहीँ बिगड़ा।

इसा परथावां का इसा ही गीत। 

अर्थ-जैसा विवाह वैसे ही गीत।

ई की मा तो ई नै ही जायो। 

अर्थ-इसके बारे मेँ अनुमान नहीँ लगाया जा सकता।

उठै का मुरदा उठै बोलेगा, अठे का अठे। 

अर्थ-एक स्थान की वस्तु दूसरे स्थान पर अनुपयोगी है।

उत्तर पातर, मैँ मियाँ तू चाकर। 

अर्थ-उऋण होने मेँ संतोष का द्योतक है।

उल्टो पाणी चीलां चढ़ै। 

अर्थ-अनहोनी की आशंका को व्यक्त करता है।

ऊंट मिठाई इस्तरी, सोनो गहणो शाह। पांच चीज पिरथी सिरै, वाह बीकाणा वाह। 

अर्थ-काव्य पंक्तियां मरुधरा की ऐसी पांच विशिष्टताओं को उल्लेखित करती है जिनकी सराहना समूची दुनिया में हो रही है।

एक हाथ मैँ घोड़ो एक मैँ गधो है। 

अर्थ-भलाई-बुराई का साथ-साथ रहना।

ऐँ बाई नै घर घणा। 

अर्थ-योग्य व्यक्ति हर जगह आदर पाता है।

ओ ही काल को पड़गो, ओ ही बाप को मरगो।  

अर्थ-कठिनाईयाँ एक साथ आती हैँ।

ओछा की प्रीत कटारी को मार। 

अर्थ-ओछा अर्थात् निकृष्ट का साथ तथा कटारी से मरना दोनोँ ही एक समान हैँ।

ओसर चूक्यां न मौसर नहीँ मिल। 

अर्थ-चूक होने पर अवसर नहीँ मिलता

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