राजस्थानी लोकोक्तियां 11



नाई री जान में सैंग ठाकर।

शब्दार्थ:- नाई की बारात में आये हुए सब लोग ठाकुर जाति के(उच्च कुल /जाति के) हैं।

भावार्थ :- निर्बल या कम सक्षम व्यक्ति के हितार्थ काम में कोई भी सहयोग करने को राजी नहीं है।

मिन्नी र खेल हुवे , उंदरा रो घर भांगे।

शब्दार्थ:- बिल्ली के खेल-खेल में चूहे का बिल टूट जाता है।

भावार्थ :- समर्थ और सक्षम व्यक्ति का ऐसा व्यहवहार जिसमें उसको तो आनंद मिले परन्तु निर्बल व्यक्ति का बहुत अधिक नुक्सान हो जाये।

दाई सुं पेट थोड़ो'ई छानों रेवै ।

शब्दार्थ:- दाई से पेट नहीं छुपाया जा सकता है।

भावार्थ :- अनुभवी व्यक्ति से किसी बात का भेद छुपाया नहीं जा सकता है।

लाडू री कोर में कुण खारो,कुण मीठो ?

शब्दार्थ:-लड्डू की ग्रास में कौनसा भाग खारा और कौनसा भाग मीठा ?

भावार्थ :- बगैर पक्षपात के सभी के साथ समान व्यहवार करना, सबको एक समान मानना।                   ⬅️पीछे और पढ़ें🇮🇳आगे और पढ़ें➡️


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