धातू को समान रख कर रोगो से बचे।

स्वस्थ और सक्रिय जीवन के लिए मनुष्य को उचित एवं पर्याप्त पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। शरीर की आहार संबंधी आवश्यकताओं के तहत पोषक तत्वों की प्राप्ति के लिए अच्छा पोषण या उचित आहार सेवन महत्वपूर्ण है।

 नियमित शारीरिक गतिविधियों के साथ पर्याप्त, उचित एवं संतुलित आहार अच्छे स्वास्थ्य का आधार है। ख़राब पोषण से रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और रोग के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है तथा शारीरिक एवं मानसिक विकास बाधित होता है तथा उत्पादकता कम हो जाती है।

 जीवन में स्वस्थ आहार उपभोग अपने सभी रूपों में कुपोषण रोकने के साथ-साथ गैर-संचारी रोगों तथा अन्य स्थितियां रोकने में भी मदद करता है, लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण/वैश्वीकरण, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के उपभोग और बदलती जीवनशैली के कारण आहार संहिता में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है।

संतुलित आहार वह होता है, जिसमें प्रचुर और उचित मात्रा में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ शामिल होते है, जिससे संपूर्ण स्वास्थ्य, जीवन शक्ति और तंदुरूस्ती/आरोग्यता बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त रूप से मिलते हैं तथा संपूरक पोषक तत्व कम अवधि की कमजोरी दूर करने की एक न्यून व्यवस्था है। तो चलिए हम जानेंगे धातु की समानता से रोग मुक्त कैसे रहे ।

खान पान से दैवी गुण

 कफ से तमोगुण, वायु से रजोगुण और पित्त से सत्वगुण उत्पन्न होता है। सभी में सम प्रकृति ही सर्वश्रेष्ठ है, मनुष्य के शरीर की सभी धातु सम बनने पर सम प्रकृति होती है, सम प्रकृति वाला मनुष्य चोरी नहीं करता, द्वेष नहीं करता, क्रोध नहीं करता, झूठ नही बोलता, अभिमान नहीं करता अर्थात् वह दैवी गुणों वाला होता है।

धातु की समता आरोग्य और धातु की विषमता रोग है, वात, पित्त और कफ की समानता आरोग्य है एवं वात, पित्त और कफ का वैषम्य ही रोग है। विकृति-बिगड़े हुए वात, पित्त और कफ ही सभीरोगों की उत्पत्ति के कारण रूप हैं। शरीर को हानि पहुंचाने वाले आहार आदि से भी दोषों का प्रकोप होकर रोग उत्पन्न होते हैं।

यदि मनुष्य इस बात का विवेक न करें कि शरीर के लिए क्या हितकर है और क्या अहितकर तो रोगों की उत्पत्ति निश्चित है, क्योंकि रोगोत्पत्ति का मूल कारण मिथ्या आहार ही है।

शरीर को निरोगी रखा जाए या रोगिष्ट बनाया जाए यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है। यदि मनुष्य चाहे तो शरीर को निरोगी रख सकता है यदि धातु की समता, सम प्रकृति अर्थात् वात, पित्त और कफ की समानता को सुरक्षित रखने का ज्ञान हो तो शरीर को स्वस्थ रखना कोई कठिन बात नहीं है।

हमारे शरीर मे कितनी धातु है ?

रस, रक्त, मांस, भेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य ये सात धातु हैं। आपके शरीर में जो धातु कम हो जाए उसको पढ़ाने वाले पदार्थों का सेवन कीजिए । अगर शरीर मे धातु वृद्धी हो जाए तो धातु बढ़ाने वाले आहार को खाना बन्द कर दें और घटाने वाले आहार का समान मात्रा में सेवन करते रहे ।

शारीर मे धातु कम होने पर क्या करे ? 

 1 .रस की कमी होने पर दूध ।

2 रक्त की कमी होने पर काली मिर्च और धारोष्ण दूध ।

3 .मांस की कमी होने पर दूध और घी ।

4 भेद की कमी होने पर मक्खन का सेवन कीजिए। 

5 अस्थि की कमी होने पर कम वसायुक्त दुग्ध उत्पाद यानी टोफू या सोया मिल्क, हरी पत्तेदार सब्जियां, फलियां, बादाम आदी का सेवन कीजिए ।

6 शरीर में मज्जा (बोनमैरो) की कमी होने पर  मज्जायुक्त द्रव्य आहार का सेवन करना चाहिए।

7 वीर्य की कमी होने पर गाय के घी और मेथी का सेवन करे।

वात, पित्त और कफ की समानता से स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है। यदि वह बढ़ते हैं तो बुद्धि का दोष और घटते हैं तो अरुची (अपच) के दोष उत्पन्न होते है।

दोष के बढ़ने पर घटाने की और घटने पर बढ़ाने की क्रिया करनी चाहिए इस प्रकार वात पित्त और कफ की समानता का रक्षण करना चाहिए ।

वायू, पित्त और कफ की समानता कैसे करे ? 

वायू

शीत, हल्की, सूक्ष्म, चलायमान, खुरदरी और शुष्क है जिस आहार या द्रव्य में इससे विरोधी गुण हो वह आहार या द्रव्य विकृत-बिगड़ी हुई वायु का शमन करते हैं जैसे:- अरंड का तेल लहसुन आदि ।

पित्त

चिकना, गर्म, तीक्ष्ण, प्रवाही, खट्टा और तीखा है। जिस आहार या द्रव्य में इन गुणों से विरोधी गुण हो वे बिगड़े हुए पित्त का शमन करते हैं । जैसे:- गाय का घी ।

कफ

भारी, ठंड, मृदु, स्निग्ध, मधुर, और चिकना है । जिस आहार या द्रव्य में इन गुणों से विरोधी गुण हो वे बिगड़े हुए कफ का शमन करते हैं, जैसे:- सोंठ, काली मिर्च, गिलोय आदी ।

आहार मे कितने रस पाए जाते है ? 

मीठा, खट्टा, खारा, कड़वा, कसैला और तीखा:- ये छ्: रस है । हर प्रकार के आहार या पदार्थ में छ रसों में से कोई रस होता है । केवल इन छ रसो के गुण वीर्य, विपाक ( परिणाम ) और प्रभाव जान लेने और तदनुसार आचरण करने से सभी रोग दूर होते हैं ।

वायु, पित्त, और कफ के दोष बढने पर कोनसे आहार ले ?

वायु का दोष बढ़ने पर मीठे, खट्टे और खारे रस वाले आहार का सेवन करना चाहिए ।

 पित्त का दोष बढ़ने पर कड़वे, कसैले और मीठे रस वाले आहार का सेवन करना चाहिए ।

 कफ का दोष बढ़ने पर कसैले, तीखे और कड़वे रस वाले आहार का सेवन करना चाहिए । ऐसा करने पर बढ़ते रोगो का शमन होता है । 

विकृति दोष के विरुद्ध गुण वाले अथवा दोष का शमन करने में सक्षम रखने वाले आहार का सेवन करने से विकृत (अप्राकृतिक ) दोष स्वयं शांत होता है ।

वायु, पित्त, कफ, वात-पित्त, पित्त-कफ, कफ-वात की प्रकृति तथा सम प्रकृति इस तरह प्रकृति के सात प्रकार हैं । जन्म से ही मनुष्य को अपनी प्रकृति प्राप्त हो जाती है । उस जन्मजात प्रकृति को बदलना अत्यंत कठिन होता है । परंतु धीरे-धीरे प्रकृति को बदला जा सकता है । यदि प्रकृति में परिवर्तन करना हो तो भागीरथ प्रयत्न करना पड़ता है । प्रकृति को परिवर्तित करने में आहार का योग सर्वाधिक रहता है ।

यदि आप समप्रकृति बनाना चाहते हैं तो आपको स्वास्थ्य- संबंधी नियमों का पालन करना चाहिए । यदि दोषों का संचय हुआ हो तो उन्हें शोधन के द्वारा दूर करना चाहिए । वात, पित्त या कफ बढ़ने न पाए इसका सदा ध्यान रखना चाहिए । वायु के बढ़ने पर ऐनिमा ( बस्ति, पम्प द्वारा सफाई करना )  का उपयोग करें, पित्त के बढ़ने पर विरेचन ले और कफ के बढ़ने पर वमन करें ।

हर व्यक्ति अपनी प्रकृति को अनुकूल पडने वाला पोषक और संतुलित सात्विक आहार का सेवन करें । संतुलित पोषक आहार के प्रमुख घटकों में नत्रज (प्रोटीन ), शर्करा ( स्टार्च ), चर्बी ( फेट ), प्रजीवक ( विटामिन्स ) और पानी समाविष्ट है ।

 हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता से 10% कम आहार ग्रहण करें । यथेच्छ मात्रा में स्वच्छ ताजा पानी, छाछ, या दूध भी पीना चाहिए ' हरेक ऋतु के फलों का भी यथाशक्ति सेवन करना चाहिए ।

यह भी पढ़ें अच्छे आहार से स्वस्थ रहे।

यह जरूर पढ़ें हमारे शरीर में सात धातु कौनसी-कौनसी हैं ? जाने

 प्रत्येक ऋतु की जलवायु भिन्न-भिन्न होने से शरीर पर उसका भिन्न-भिन्न असर होता है । अतः ऋतु के अनुसार आहार में भी आवश्यक परिवर्तन करना चाहिए । ऐसा करने से ऋतु की ठंडी गर्मी या अन्य असर सहन करने और उनका प्रतिकार करने की शारीरिक शक्ति बनी रहेगी ।


Previous
Next Post »