संदेश

अप्रैल 1, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इंद्रायण आपके पास है। क्या आप जानते हैं ?

चित्र
                              इंद्रायण इंद्रायण की बेल मध्य, दक्षिण तथा पश्चिमोत्तर भारत, अरब, पश्चिम एशिया, अफ्रीका के उच्च भागों तथा भूमध्य सागर के देशों में भी पाई जाती है।  इसके पत्ते तरबूज के पत्तों के समान, फूल नर और मादा दो प्रकार के तथा फल नारंगी के समान 2 से 3 इंच तक व्यास के होते हैं। इसके फल कच्ची अवस्था में हरे, पश्चात पीले हो जाते हैं और उन पर बहुत सी श्वेत धारियां होती हैं। इसके बीच भूरे, चिकने, चमकदार, लंबे गोल तथा चिपटे होते हैं ।इस बेल का प्रत्येक भाग कड़वा होता है। इंद्रायण का प्रयोग भारतवर्ष में अत्यंत प्राचीन काल से किया जा रहा है। चरक व सुश्रुत-संहिता में इसका उल्लेख कई स्थानों पर प्राप्त होता है। इसके फल को मलबद्धता में तिक्ष्ण विरेचनार्थ प्रयोग किया जाता है। यह पैत्तिक विकार, ज्वर और पक्वाशय के कृर्मियों पर विशेष उपयोगी है।  इसकी जड़ का प्रयोग जलोदर, कामला, आमवात एवं मूत्र संबंधी व्याधियों पर विशेष लाभकारी माना गया है।  इंद्रायण की समस्त भारत वर्ष में विशेषतः बालूका मिश्रित भूमि में स्वयंजात वन्यज या कृषिजन्य बेलें पाई जाती हैं। इसकी 3 जातियां पाई जाती है