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इलायची के 20 घरेलू नुस्खे।

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इलायची भारत में मैसूर, मंगलोर, मालाबार में उगाई जाती है। जबकि श्रीलंका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया में इलायची बहुत ज्यादा उगाई जाती है।  बड़ी इलायची का विश्व में सबसे बड़ा उत्पाद नेपाल देश मैं होता है। उसके बाद क्रमशः भारत और भूटान हैं। छोटी इलायची को संस्कृत में एला, तीक्षणगंधा इत्यादि और लैटिन में एलटेरिआ, कार्डामोमम कहते हैं।                                                               भारत में इलायची का उपयोग अतिथिसत्कार, मुखशुद्धि तथा पकवानों को सुगंधित करने के लिए और धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग किया जाता है।  आयुर्वेदिक अनुसार छोटी-बड़ी इलायची के 20 लाभ 1 इलायची का नियमित सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात दी जा सकती है। इलायची के एंटी इंफेलेमेंटरी तत्व मुंह का कैंसर त्वचा के कैंसर की कोशिकाओं से लड़ने में कारगर साबित होते हैं। 2 अगर आप किसी यौन रोग से परेशान है, तो ऐसे में रात को सोते वक्त दूध में इलायची को अच्छे से उबालकर शहद मिलाकर सेवन करें छोटे दिखने वाली हरी इलायची रामबाण का काम करेगी। 3 धातु पुष्टि के लिए रात में भिगोए हुए दो बादाम सुबह छिलका उतार कर

औषधीय गुणों से भरपूर है लौंग ।

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लौंग मलैका का देशज है किंतु अब सारे उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में बहुतया प्राप्त है। जंजीबार में समस्त उत्पादन का 90% लौंग पैदा होता है। जिसका बहुत सा हिस्सा मुंबई से होकर बाहर भेजा जाता है, सुमात्रा, जमैका, ब्राज़ील, पेबा एवं वेस्ट इंडीज में भी पर्याप्त लौंग उपजता है।  वैज्ञानिक नाम (वानस्पतिक नाम:)  syzygium aromaticum लौंग को अंग्रेजी में क्लोव (clove) कहते हैं। लौंग संस्कृत में पिप्पलि कहा जाता है।                                             लौंग एक प्रकार का मसाला है, भारतीय पकवान में इस्तेमाल किया जाता है। इसे औषधि के रूप में भी उपयोग किया जाता है। और धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग किया जाता है। उत्पादक देश     चीन से लौंग का उपयोग इसा से तीन शताब्दी पूर्व से होता चला आ रहा है। तथा रोमन लोग भी इससे अच्छी तरह परिचित थे, किंतु यूरोपीय देशों में इसकी जानकारी 16 वीं शताब्दी में तब हुई जब पुर्तगालि लोगों ने मलैका द्वीप में इसे खोज निकाला। वर्षों तक इसके वाणिज्य पर पुर्तगालियों एवं डचों का एक छत्र अधिपत्य रहा है। लौंग के चमत्कारी फायदे आपको जानकर हैरानी होगी कि लौंग स

चमगादड़ों पर शोध और खर्चा।

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एक ताजा शोध से पता चला है कि स्तनपायी जानवरों में तिन लाख बिस हजार से ज्यादा वायरस हो सकते हैं।           शोधकर्ताओं का कहना है, कि इनसे विषाणु जनित रोगों, विशेष रूप से मनुष्य में फैलने वाले वायरस की खोज से भविष्य की महामारीयों को रोकने में मदद मिलेगी।        शोधकर्ता टीम का अनुमान है कि इसमें छः अरब डाॅलर ($6000000000) की लागत आएगी, लेकिन यह लागत बड़ी महामारीयों से निपटने की लागत का एक हिस्सा मात्र है।           यह शोध एम बायो जर्नल में प्रकाशित हुआ था। चमगादड़ पर शोध       इंसानों में संक्रमित करने वाले 70 पीसदी वायरस जैसे एच आई वी, इबोला और द न्यू मिडिल ईस्ट रेस्पिकेट्री सिंड्रोम (मर्स) वन्यजीवों में उत्पन्न होते हैं।        लेकिन अभी तक वैज्ञानिकों के लिए समस्या के विस्तार का मूल्यांकन काफी कठिन बना हुआ है।      शोधकर्ताओं ने जांच के लिए अमेरिका और बांग्लादेश में चमगादड़ की एक प्रजाति गादुर (फ्लाइंग फॅक्स) का अध्ययन किया चमगादड़ो से लिए गए एक हजार आठ सौ सन्तानवे (1897) सैंपलों का अध्ययन कर शोधकर्ता अनुमान लगाने में सफल रहे कि वे कितने अन्य रोगाणुओं को ले जाने में सक्ष