इंद्रायण आपके पास है। क्या आप जानते हैं ?


                              इंद्रायण
इंद्रायण की बेल मध्य, दक्षिण तथा पश्चिमोत्तर भारत, अरब, पश्चिम एशिया, अफ्रीका के उच्च भागों तथा भूमध्य सागर के देशों में भी पाई जाती है।
 इसके पत्ते तरबूज के पत्तों के समान, फूल नर और मादा दो प्रकार के तथा फल नारंगी के समान 2 से 3 इंच तक व्यास के होते हैं। इसके फल कच्ची अवस्था में हरे, पश्चात पीले हो जाते हैं और उन पर बहुत सी श्वेत धारियां होती हैं। इसके बीच भूरे, चिकने, चमकदार, लंबे गोल तथा चिपटे होते हैं ।इस बेल का प्रत्येक भाग कड़वा होता है।

इंद्रायण का प्रयोग भारतवर्ष में अत्यंत प्राचीन काल से किया जा रहा है। चरक व सुश्रुत-संहिता में इसका उल्लेख कई स्थानों पर प्राप्त होता है। इसके फल को मलबद्धता में तिक्ष्ण विरेचनार्थ प्रयोग किया जाता है। यह पैत्तिक विकार, ज्वर और पक्वाशय के कृर्मियों पर विशेष उपयोगी है।
 इसकी जड़ का प्रयोग जलोदर, कामला, आमवात एवं मूत्र संबंधी व्याधियों पर विशेष लाभकारी माना गया है।
 इंद्रायण की समस्त भारत वर्ष में विशेषतः बालूका मिश्रित भूमि में स्वयंजात वन्यज या कृषिजन्य बेलें पाई जाती हैं। इसकी 3 जातियां पाई जाती है। छोटी इंद्रायण, बड़ी इंद्रायण, एवं जंगली इंद्रायण। हर प्रकार की इंद्रायण में 50 से 100 तक फल लगते हैं।

संस्कृत में इसे चित्रफल, इंद्रवारुणी, आवाक्षी, गवादनी, वारुणी
हिंदी में इनारुन, अरुण इंद्रायण, इंद्रायन इंदिरारुन, गोरुम्ब
उर्दू में इंद्रायण
बॅगला और गुजराती में इंद्रायन
मराठी में कडू इंद्रावण
अंग्रेजी में काॅलोसिंथ या बिटर ऐपल  (colocynthis)
लैटिन भाषा में सिट्रलस कॉलोसिंथस (Citrullus Colocythis)
लोक भाषाओं में गड़तुम्बा, गडूम्बा,पापड़ पिंदा आदि नामों से जाना जाता है। अन्य दो वनस्पतियों को भी इंद्रायन कहते हैं।

1विद्रधि के लिय
 लाल इंद्रायण और बड़ी इंद्रायण की जड़ दोनों को बराबर पीसकर लेप बनाकर विद्रधि पर लगाने से लाभ होता है।

2 फोड़े फुंसी के लिए
 गर्मी से नाक में फोड़े हो जाते हैं, जिनमें से सड़ा हुआ पीप निकलता हो, उन पर इंद्रायण फल को पीसकर नारियल तेल के साथ मिलाकर लगाने से लाभ होता है।

3 बिच्छू विश के लिए
6 ग्राम इंद्रायण फल का सेवन करने से वृश्चिक दंशजन्य वेदना तथा दाह आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।

4 सर्पदंश के लिए
3 ग्राम बड़ी इंद्रायण के मूल चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर खाने से सिर्पदंशजन्य वेदना तथा दाह आदि विषाक्त प्रभावो का शमन होता है।

5 सफेद बालों को काला करने के लिए
इंद्रायण बीज के तेल को सिर पर लगाने से अथवा 3 से 5 ग्राम इंद्रायण बीज चूर्ण को गाय के दूध के साथ सेवन करने से केश काले हो जाते हैं।

6 गंजेपन की समस्या के लिए
इंद्रायण के पत्तों को कूटकर 50 ग्राम रस निकाल लें, 50 ग्राम तिल के तेल के अंदर पकाओ। जब पूरा रस उड़ जाए फिर इस तेल से रात को सिर पर मालिश करने से आप गंजेपन की शिकायत से छुटकारा पा सकते हैं और बाल झड़ना बंद हो जाएंगे।

7 सिर दर्द के लिए
इंद्रायण फल के रस या जड़ के छाल को तिल के तेल में उबालकर तेल को मस्तक पर मलने से मस्तक पीड़ा या बार-बार होने वाले सिर दर्द से आराम मिलता है।

8 गठिया रोग के लिए
गठिया रोग में इंद्रायण के गूदे के आधा किलो रस में हल्दी, सेंधा नमक, बड़े हुतनीला की छाल 11 ग्राम डालकर बारीक पीस लें। जब पानी सूख जाए तो चार-पांच ग्राम की गोलियां बना लें एक-एक गोली सुबह शाम दूध के साथ सेवन करने से गठिया से जकड़ा हुआ रोगी जिसको ज्यादा से ज्यादा सूजन तथा दर्द हो थोड़े ही दिनों के प्रयोग से अच्छा होकर चलने फिरने लग जाता है।

9 गांठ के लिए
इंद्रायण के पत्तों को पीसकर लेप बना लें इस लेप को गांठ पर लगाने से गांठ बैठ जाती है।

10 कब्ज के लिए
इंद्रायण के फलों को घिस कर नाभि पर लगाएं और इसकी जड़ का चूर्ण 2 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सोते समय ले कब्ज में लाभ होगा।

11 बवासीर के लिए
इंद्रायण के बीजों को पानी में पीसकर लेप बनाकर बवासीर के मस्सों पर दिन में दो बार कुछ हफ्ते तक लगाने से लाभ होता है।

12 कान के रोगों के लिए
इंद्रायण के कच्चे फल को तिल के तेल में डालकर पका लें फिर इसे छानकर एक शीशी में भर लें इस तेल की 1-2 बूंदे सुबह और शाम कान में डालने से कान के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।

13 पेट के कीड़ों के लिए
इंद्रायण की जड़ को पानी में अच्छी तरह घिसकर गुदा (मल निकलने के द्वार) पर बाहर और अंदर लगाने से लाभ होता है।

14 दांत के कीड़ों के लिए
इसके पके हुए फल की धूनी दांतों में देने से दांत के कीड़े मर जाते हैं।

15 पेशाब में दर्द और जलन के लिए
इंद्रायण की जड़ को पानी के साथ पीसकर और छानकर 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से पेशाब करते समय का दर्द और जलन दूर हो जाती हैं।

                     इंद्रायण के नुकसान
जड़ी बूटियों के रूप में इंद्रायण का उपयोग किया जाता है। लेकिन यदि इसका अधिक मात्रा में सेवन किया जाता है तो इसके कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते है।

• अधिक मात्रा में इसका सेवन आंतों के नुकसान और रक्त स्त्राव से जुड़े घावों का कारण बन सकता है।

• इंद्रायण का सेवन करने से कुछ लोगों को गंभीर दस्त की समस्या हो सकती है।

• गर्भावस्था और स्तनपान करने वाली महिलाओं को इंद्रायण जड़ी बूटी का उपयोग डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।

• यदि आप किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या के लिए दवाओं का सेवन करते हैं, तो इंद्रायण का सेवन करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह ले।
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