खतरनाक वायरसों में से एक इबोला वायरस।



यह वायरस संक्रमित जानवर सामान्यतया बंदर फ्रूट बैट [एक प्रकार का चमगादड़] के खून या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में आने से होता है।


     डब्ल्यूएचओ 2014 के हिसाब से प्राकृतिक वातावरण में हवा से इसके फैलने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। ऐसा माना जाता है कि फ्रूट बैट प्रभावित हुए बिना यह वायरस रहते और फैलते हैं ।
जब मानवी संक्रमण होता है तो यह बीमारी लोगों के बीच फेल सकती है। पुरुष उत्तरजीवी इस वायरस की वीर्य के माध्यम से तकरीबन 2 महीने तक संचरित कर सकते हैं। रोग की पहचान करने के लिए आमतौर पर समान लक्षण वाली दूसरी बीमारियों जैसे मलेरिया, हैजा और अन्य वायरल हेमोराहैजिक बुखार को पहले अपवर्जित कर सकते हैं।
     रोग की पहचान की पुष्टि करने के लिए खून के नमूनों को वायरल एंटीबॉडीस वायरल आरएनए या खुद वायरस के लिए जांच की जाती है।
      यह एक गंभीर बीमारी का रूप धारण कर चुका है इस बीमारी में शरीर में नसों से खून बाहर आना शुरू हो जाता है जिससे अंदरूनी रक्त स्त्राव प्रारंभ हो जाता है यह एक अत्यंत घातक रोग है इसमें 90% रोगियों की मृत्यु हो जाती है।
 
शुरुआत
   इस रोग की पहचान सर्वप्रथम सन 1976 में इबोला नदी के पास स्थित एक गांव में की गई थी, इसी कारण इसका नाम इबोला पड़ा।
       इबोला एक ऐसा रोग है जो मरीज के संपर्क में आने से फैलता है। मरीज के पसीने, मरीज के खून या श्वास से बचकर रहें इसकी चपेट में आने से टाइफाइड, कॉलरा, बुखार और मांसपेशियों में दर्द होता है, बाल झड़ने लगते हैं, नसों से मांसपेशियों में खून उतर आता है।
      इससे बचाव करने के लिए खुद को सतर्क रखना ही उपाय है। यह वायरस सबसे पहले अफ्रीका में पाया गया था इबोला के मरीजों की 50 से 80 फ़ीसदी मौत रिकॉर्ड की गई है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगलों वाले मध्य और पश्चिम अफ्रीका के दूरदराज गांवों में यह बीमारी फैली पूर्वी अफ्रीका की ओर कांगो यूगांडा और सूडान में भी इसका प्रसार हो रहा है, पूर्व की और बीमारी का प्रसार असामान्य है क्योंकि यह पश्चिम की ओर ही केंद्रित था। और अब शहरी इलाकों को भी अपनी चपेट में ले रहा है,
इस बीमारी की शुरुआत गिनी के दूरदराज वाले इलाके जेरेकोट में हुई थी, डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इलाज करने वालों को दस्ताने और मास्क पहनने चाहिए और समय-समय पर हाथ धोते रहना चाहिए।
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    रोग फैलने के कारण



              यह रोग पसीने और लार से फैलता है, संक्रमित खून और मल के सीधे संपर्क में आने से भी यह रोग फैलता है। इसके अतिरिक्त यौन संबंध और इबोला से संक्रमित शव को ठीक तरह से व्यवस्थित न करने से भी यह रोग हो सकता है, यह संक्रामक रोग है।
बिना सावधानी के इलाज करने वाले चिकित्सकों को भी इससे संक्रमित होने का भारी खतरा रहता है।
मनुष्य में इसका संक्रमण संक्रमित जानवरों जैसे चिंपैंजी, चमगादड़ और हिरण आदि के सीधे संपर्क में आने से होता है। यहां तक कि इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी खतरे से खाली नहीं होता शव को छूने से भी इसका संक्रमण हो सकता है।
      यह भी आशंका है कि संक्रमित चमगादड़ों के मल-मूत्र के संपर्क में आने से इबोला वायरस फैल सकता है।
 बताते हैं कि अफ्रीका की गुफाओं में जाने पर पर्यटक इस वायरस से संक्रमित हो गए थे।

    लक्षण
   इसके लक्षण हैं उल्टी, दस्त, बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द, कमजोरी, रक्त स्त्राव, आंखे लाल होना, मुंह, कान-नाक से खून बहना, शरीर पर फुंसी हो जाना या शरीर में छोटे-छोटे लाल दाग हो जाना और गले में कफ
 अक्सर इसके लक्षण प्रकट होने में 2 दिन से लेकर 3 सप्ताह तक का वक्त लग सकता है।  इसकी पहचान और भी मुश्किल है इससे संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने के 7 सप्ताह तक संक्रमण का खतरा बना रहता है।

  रोग में शरीर को क्षति
     इस रोग में रोगी की त्वचा गलने लगती है यहां तक कि हाथ पैर से लेकर पूरा शरीर गल जाता है ऐसे में रोगी से दूर रहकर ही इस रोग से बचा जा सकता है।



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