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ऋग्वेद

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!10!19   अर्थात- ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद चारों वेद एक ही ईश्वरीय ज्ञान से  प्रादुरभूत हुए हैं। उनमें किसी प्रकार का अंतर करना अथवा भेदभाव प्रकट करना अनुचित और अनावश्यक है !पर मनुष्यों में प्राय स्वार्थ बुद्धि की प्रधानता रहती है जिसके कारण वे अपने ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाकर मतभेद और फूट का बीज बो देते हैं। यही कारण था कि बाद में इसी देश में ऐसे कितने विद्वान पैदा हो गए जिन्होंने  वेद की इस समन्वयवादी शिक्षा मूलाधार ज्ञान, उपासना और कर्म में केवल एक को पकड़ कर दूसरे की निंदा करनी आरंभ कर दी शंकराचार्य जैसे महान व्यक्ति भी लोगों को ऐसे ही उपदेश देने लगे कि इन तीनों में "ज्ञान ही उद्धार का मार्ग है‌। कर्म बंधन में डालने वाला है इसलिए ज्ञानी व्यक्ति को  कभी  कर्म नहीं करना चाहिए। "इधर उपासना का डंका पीटने वालों ने भक्ति को ही सर्वश्रेष्ठ बतला कर  ज्ञान और कर्म की अपेक्षा करने की प्रेरणा दी! गीता कार ने वेदों के आदर्श पर ज्ञान ,कर्म और उपासना के समन्वय का उपदेश दिया! पर इन प्रतिद्वंद्वी  मनोवृति के आचार्यों ने उनके भी बीसीओ तरह के भाषणअपने -अपने सिद्धांत का

Ved gyaan

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 पहला धर्म हिंदू धर्म सनातन धर्म ही है हिंदू धर्म अति प्राचीन है इस धर्म को वेद काल से भी पूर्व का माना जाता है क्योंकि वेद काल और वेदों की रचना का काल अलग-अलग माना जाता है  यहां शताब्दियों से मौखिक परंपरा चलती रही है जिसके द्वारा हिंदू धर्म का इतिहास व ग्रंथ आगे बढ़ते रहे हैं    उसके बाद इसे लिपिबद्ध करने का  काल भी बहुत लंबा चला है हिंदू धर्म के सर्व पूज्य ग्रंथ है वेद वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई                विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल का आरंभ 2000 ईस्वी पूर्व से माना है यानी वेद  धीरे-धीरे रचे गए थे और अंततः  पहले वेद को तीन भागों मैं संकलित किया गया   ऋग्वेद यजुर्वेद और सामवेद जिसे वेदत्रई कहा जाता था     मान्यता अनुसार वेद का विभाजन राम के जन्म से पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था    बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि अथर्वा द्वारा किया गया एक और मान्यता अनुसार श्री कृष्ण के समय में वेदव्यास ने वेदों का विभाजन कर उन्हें लिपिबद्ध किया था   हिंदू धर्म मैं देवता- दिव्य धातु जिसका अर्थ प्रकाशमान है कोई भी परालौकिक शक्ति का पात्र जो अमर और प्राकृतिक है और