गीतासार


 अष्टांङ्गयोगयुक्त और वेदान्तपारङ्गत मनुष्योंके लिए आत्म-कल्याण संभव है।
आत्म-कल्याण ही परम कल्याण है, उस आत्मज्ञानसे उत्कृष्ट और कुछ भी लाभ नहीं है।
 आत्मा देहरहित, रूप आदिसे हीन, इंद्रियोंसे अतीत है।
मैं आत्मा हूँ, संसारादि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका दु:ख नहीं है।
 धूमरहित प्रज्वलित अग्निशिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वयं प्रदीप्त रहता है। जैसे आकाशमें विद्युत्-अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही ह्रदयमें आत्माके द्वारा आत्मा प्रकाशित होता है।
श्रोत्र आदि इंद्रियोंको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं है। वे स्वयंको भी नहीं जान सकती हैं, परंतु सर्वज्ञ, सर्वदर्शी क्षेत्रज्ञ आत्मा ही इंद्रियोंका दर्शन करता है। जब आत्मा उज्जवल प्रदीपके समान ह्रदयपटलपर प्रकाशित होता है, तब पुरुषोंका पापकर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। जैसे दर्पणमें दृष्टि डालनेपर अपने द्वारा अपनेको देख सकते हैं, वैसे ही आत्मामें दृष्टि करनेपर इंद्रियोंको, इंद्रियोंके विषयोंको तथा पंञ्चमहाभूतोंका दर्शन किया जा सकता है।
 मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त पुरुष-इन सभीके ज्ञानके द्वारा संसार-बंधनसे मुक्त हो जाना चाहिये।
 सभी इंद्रियोंका मनमें अभीनिवेश कर उस मनको अहंकारमें स्थापित करना चाहिये।
 उस अहंकारको बुद्धिमें, बुद्धिको प्रकृतिमें, प्रकृतिको पुरुषमें एवं पुरुषको परब्रह्ममें विलीन करना चाहिये।
 इस प्रकार करनेसे ही ''मैं ब्रह्म हूँ'' इस प्रकारकी ज्ञान-ज्योति का प्रकाश होता है।
 इससे वह पुरुष मुक्त हो जाता है। नौ द्वारोंसे युक्त, तीनों गुणोंके आश्रय तथा आकाश आदि पञ्चभूतात्मक और आत्मासे अधिष्टित इस शरीरको जो ज्ञानी व्यक्ति जान लेता है। वही श्रेष्ठ है और वही क्रान्तदर्शी है। सौ अश्वमेघ या हजारों वाजपेय यज्ञ इस ज्ञानयज्ञके सोलहवें अंशके फलको भी प्रदान नहीं कर सकते। (कल्याण अध्याय २३७)
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