धर्मसार-कर्म फल



अब मैं सभी पापों का विनाश करने वाले तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले अतिशय सूक्ष्म धर्मसार को संक्षेपमें कहता हूं, आप सुने।



     शौक शास्त्रीय ज्ञान, धर्म, बल, धेर्य, सुख और उत्साह- इन सबका हरण कर लेता है। अर्थात् शोकके प्रभावसे सभी सात्विक वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसलिए सर्वतोभावसे शोकका परित्याग करना चाहिये।
   कर्म ही दारा (स्त्री) है, कर्म ही लोक है, कर्म ही संबंधी है, कर्म ही बांधव है। (अर्थात् स्त्री, लोक, संबंधी एवं बांधव आदि कर्मके अनुसार ही मिलते हैं।)
 कर्म ही सुख-दु:खका मूल कारण है। (अतः उत्तम कर्म करनेके लिए सदा सावधान रहना चाहिये।) दान ही परमधर्म है। दानसे ही पुरुषको सभी अभीष्ट प्राप्त होते हैं। दान ही पुरुषको स्वर्ग और राज्य प्रदान करता है। इसलिए मनुष्यको दान अवश्य करना चाहिये-
      दानमेव परो धर्मों दानात्सर्वमवाप्यते।
    दानात्स्वर्गश्च राज्यं च दद्याद्दानं तो नरः।।(२२१।४)

 विधिपूर्वक प्रशस्त दक्षिणाके साथ दान तथा भयभीत प्राणीकी प्राणरक्षा- ये दोनों समान हैं। यथाविधि तपस्या, ब्रह्मचर्य, विविध यज्ञ एवं स्नानमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य भयभीत प्राणीके प्राणोंकी रक्षासे प्राप्त होता है। जो लोग धर्म का नाश करते हैं, वे नरक में जाते हैं।
 जो होम, जप, स्नान, देवतार्चन आदि सत्कार्यमें तत्पर रहकर सत्य, क्षमा, दया आदि सद्गुणोंसे संपन्न रहते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं।

कोई भी किसीको सुख या दु:ख नहीं देता है और न किसीका सुख-दु:ख हरण कर सकता है। सभी अपने किये हुए कर्मके अनुसार सुख-दु:खका भोग करते हैं-
      न दाता सुखदु:खदानें न च हर्तास्ति कश्चन।
      भुञ्जते स्वकृतान्येव दु:खानि च सुखानि च।।
                                                            (२२१।८)
 जो धर्मकी रक्षाके लिये जीवनदान करता है, वह सभी विषय परिस्थितियों (कठिनाइयों)- को पार कर जाता है। जिनका चित्त सदा संतुष्ट रहता है, वह फल, मूल,शाक आदिके द्वारा जीवनधारण करके भी सुखकी अनुभूति करते हैं-
        धर्मार्थं जिवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते।
      सन्तुष्टः को न शक्नोति फलमूलैश्च वर्तितुम्।।
                                                                (२२१।९)
 सुखकी लालसामें सभी मनुष्य संकटकी स्थितिमें पङते हैं। यह लोभका ही परिणाम है, जो अत्यंत दुष्कर है। मनुष्य के चित्तमें लोभ उपस्थित होनेसे ही क्रोध उत्पन्न होता है। लोभके कारण ही मनुष्य हिंसा आदि गर्हित कार्योंमें प्रवृत होता है। मोह, माया, अभिमान, मात्सर्य, राग, द्वेष, असत्यभाषण एवं मिथ्याचरण- ये सभी लोभसे उत्पन्न होते हैं। लोभसे ही मनुष्य मोह और मदसे उन्मत्त हो जाता है।( इसलिये लोभका परित्याग करना चाहिये) जो शान्त व्यक्ति लोभका परित्याग करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे रहित होकर परमलोकको प्राप्त करता है।

  देवता, मुनि, नाग, गंधर्व, गुह्यकगण-ये सभी धार्मिकोंकी पूजा करते हैं। धनाढ्य और कामी व्यक्तिकी अर्चना कोई भी नहीं करता है-

            देवता मुनर नागा गन्धर्वा गुह्यका हर।
          धार्मिकं पूजयन्तीह न धनाढ्यं न कामिनम्।।
                                                                 (२२१।१३) 
 अनंत बल, वीर्य, प्रज्ञा और पुरुषके द्वारा किसी दुर्लभ वस्तुको यदि मनुष्य प्राप्त कर लेता है तो इसके कारण किसीको ईर्ष्यावश शोकाकुल या दु:खी नहीं होना चाहिये। सभी प्राणियोंके प्रति दयाका भाव रखना, सभी इंद्रियोंका निग्रह करना और सर्वत्र अनित्यबुद्धि रखना यह प्राणियों के लिये परम श्रेयस्कर है। *मृत्यु सामने वर्तमान है*, यह समझकर जो व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता, उसका जीवन बकरी के गले में स्थित सथ समान निरर्थक है-
         
             सर्वसत्त्वदयालुत्वं             सर्वेन्द्रियविनिग्रह:।
             सर्वत्रानित्यबुद्धित्वं    श्रयः   परमिंदर  स्मृतम्।।
             पश्यन्निवाग्रतो    मृत्युं    यो    धर्मं   नाचरेन्नरः।
             अजागलस्तनस्येव    तस्य   जन्म   निरर्थकम्।।
                                                             (२२१।१५-१६)
 इस लोकमें गोदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। जो न्यायोपार्जित धनसे प्राप्त गौका दान करते हैं, वे अपने संपूर्ण कुलको तार देते हैं।
   अन्न-दानसे श्रेष्ठ और कुछ भी दान नहीं है;
                     क्योंकि संपूर्ण चराचर जगत् अन्नके द्वारा ही प्रतिष्ठित है। कन्यादान, वृषोत्सर्ग, जप, तीर्थ, सेवा, वेदाध्ययन, हाथी, घोड़ा, रथ आदिका दान, मणिरत्न और पृथ्वीदान- ये सभी दान अन्नदानके सोलहवें अंशकी भी बराबरी नहीं कर सकते हैं। अन्नसे ही प्राणियोंके प्राण, बल, तेज, वीर्य, धृति और स्मृति- ये सभी प्रतिष्ठित रहते हैं। जो कूप, वापसी, तड़ाग और उपवनका निर्माणकर लोगोंकी संतुष्टिके लिए प्रदान करते हैं,। वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।

   साधुओंका दर्शन करना अतिशय पुण्दायक है। यह सभी प्रकारके तीर्थोंसे भी उत्तम है। तीर्थ तो समय आनेपर फल प्रदान करता है, किंतु सज्जनोंका संग उसी क्षण फल प्रदान कर देता है-
               साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थादपि विशिष्यते।
               कालेन तर्थं फलति सद्यः  साधुसमागमः।।
                                                             ( २२१।२३)
 सत्य, दम, तपस्या, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, शम, दया और दान- इनको सनातनधर्म माना गया है-
              सत्य दमस्तपः शौचं सन्तोषश्च  क्षमार्जवम्।
              ज्ञानं नमो  दया  दानमेष धर्मः     सनातनः।।
                                                                  (२२१।२४)
                                                             (अध्याय २२१)
 दोस्तो मेरा नाम ओमप्रकाश शर्मा है आपको गरूर पुराण की प्रेराणा से लिखा पोस्ट कैसा लगा आप हमे कमेंट मे लिखकर जरूर बताएं और हमारी वेबसाइट को सब्सक्राइब कर ले ताकि आपको हर पोस्ट की नोटिफिकेशन मिलती रहे  और आपके ज्ञान में वृद्धि होती रहे। धन्यवाद
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