अनजाने में होने वाला visualization



बचपन में होने वाला विज्यूलाइजेशन
 बच्चे बहुत कल्पनाशील होते हैं। दिनभर अधिकांशत: वे कल्पना करते रहते हैं। कहानी सुनते वक्त जंगल, प्राणियों, परी और राजकुमार के काल्पनिक चित्र बच्चे के मन में उभरते रहते हैं।


 डराने वाली कोई बात करता है तो बच्चे के मन में डरावना चित्र आकार लेने लगता है। नासमझ माता-पिता जब कभी जाने-अनजाने बच्चे को डराते हैं तब उसके कोमल मन के ऊपर भूत और राक्षसों के चित्र छपते जाते हैं। टीवी पर कार्टून सीरियल देखते समय बालक के मन मे कार्टून के चित्र छप जाते हैं। और सीरियल पूरा होने के बाद भी कायम रहते हैं।बहुत लंबे समय तक यह फेंटेसी उनके मन में से निकलती नहीं है। इन कार्टूनों की आवाज निकाल निकाल कर बच्चे खेलते रहते हैं। बच्चों को घर-घर खेलते देखना अच्छा अनुभव है। कोई पापा बन जाता है तो कोई बहन कभी कोई डॉक्टर तो कोई दुकानदार बन जाता है। दूसरे अन्य बच्चे उनकी दुकान से चीजें खरीदने जाते हैं इस तरह घर-घर खेलते समय बच्चों के मन में अनजाने में ही सही अपने भविष्य का विज्युलाइजेशन होता रहता है। जब यह घर-घर खेलते हैं तब घर व अन्य वस्तुएं प्रतीकात्मक होने के बावजूद वे कितना अद्भुत अभिनय करते हैं बगैर बर्तन के भोजन तैयार हो जाता है और बगैर भोजन के खाने भी लगते हैं कुछ वस्तुएं नहीं होने पर भी बच्चे इतनी सच्ची लगन से खेलते हैं कि ऐसा लगता है जैसे वास्तव में घर बसा लिया हो।
 कुछ बच्चे दोनों हाथ आगे कर दादा की लकड़ी को दोनों हाथों से पकड़ पूरे घर में दौड़ भाग करते रहते हैं यदि उनसे पूछा जाए तो कहते हैं बाइक चला रहा हूं।
 थाली या प्लेट हाथों में पकड़ बच्चा बड़ी सान से कुर्सी पर बैठा होता है जब उससे पूछा जाता है कि क्या कर रहे हो बेटा तो तुरंत हंस कर जवाब देता है ''कार चला रहा हूं।'' पास ही गियर का डंडा भी रखा होता है। इन खेलों में बच्चों को पूरा आनंद मिलता है। जैसे वास्तव में कार चला रहा हो उसी तरह से ब्रेक मारता है, होरन बजाता है, दरवाजा बंद करता है और काँच चढ़ाकर साइड भी देता है।
 युवावस्था में जो लोग वास्तविक कार चलाने में जितना आनंद नहीं ले पाते उतना आनंद बालक काल्पनिक कार चलाने में प्राप्त कर लेते हैं। बस यही तो विज्युलाइजेशन है। मन में बनने वाले इन चित्रों को यदि पोषण मिले तो भविष्य में यह वास्तविकता में बदल जाते हैं।

बच्चों को सर्वश्रेष्ठ भेंट
बच्चे की उपस्थिति के समय या बच्चों के सामने बात करते समय आपकी बात या कहानी इस प्रकार की होनी चाहिए कि उससे बच्चे के मन में सुंदर और सकारात्मक चित्र बने। सरल, सुख, खुशी, हास्य, सहजता, उत्साह, महान, दुलार, मित्रता, दया, सुंदर, बड़ा, भव्य, जबरदस्त, परिश्रम, आदर, नम्रता, लक्ष्य, सफलता आदि शब्दों का अधिक से अधिक उपयोग करें।
 संक्षिप्त में आपकी बातों और कहानियों से आप के बच्चे को जाने-अनजाने में निम्नलिखित 5 संदेश मिलना ही चाहिए।
1 यह दुनिया अच्छी है।
2 मेरा परिवार अच्छा है।
3 मुझे बड़े काम करना है।
4 बड़े काम मैं कर सकता हूं।
5 मैं सुखी हूं।


   अगर बच्चों को महान बनाना है तो उसे बचपन से ही सकारात्मक मानसिक चित्र प्रदान करें और यदि आप चाहे तो यह काम कर सकते हैं। भारत के आने वाले कल की वास्तविकता बच्चों के आज के विज्यूलाइजेशन पर आधारित है।
                  
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