अनमोल मोती



शिष्य दुर्लभ है, गुरु नहीं।
                           सेवक दुर्लभ है, सेव्य नहीं।
जिज्ञासु दुर्लभ है, ज्ञान नहीं।
                            भक्त दुर्लभ है, भगवान् नहीं।

-------------------------------------------------------------------

अगर भगवान् की दया चाहते हो तो अपने से छोटों पर दया करो, तब भगवान् दया करेंगे।
                        दया चाहते हो, पर करते नहीं- यह अन्याय है, अपने ज्ञान का तिरस्कार है।

-------------------------------------------------------------------

मनुष्य को वही काम करना चाहियें, जिससे उसका भी हित हो और दुनियाका भी हित हो, अभी भी हित हो और परिणाम में भी हित हो।

-------------------------------------------------------------------

जो दिखता है, उस संसार को अपना नहीं मानना है, प्रत्युत उसकी सेवा करनी है और जो नहीं दिखता, उस भगवान् को अपना मानना है तथा उसको याद करना है

-------------------------------------------------------------------

ऐसा मान लो कि में भगवान का हूं। अगर मैं संसार का हूं'- ऐसा मानोगे तो संसार का काम दूर रहा, भगवान् का भजन करते हुए भी भगवान् को भूल जाओगे।

-------------------------------------------------------------------

धन से अधिक वस्तुओंका महत्व है, वस्तुओं से अधिक मनुष्य का महत्व है, मनुष्य से अधिक विवेक का महत्व है और विवेक से अधिक परमात्मतत्व का महत्व है।
                                  उस परमात्मतत्व की प्राप्ति में ही मनुष्य जन्म की सफलता है।
Previous
Next Post »