सात बाते विद्यार्थियों में जोश पैदा कर देंगी एक बार जरूर पढ़ें



            इन सात बातों का विस्तार इस प्रकार है

 1 विद्यार्थियों में यह उत्सव होना चाहिए कि मैं विद्याको पढ़ सकता हूं क्योंकि उत्साही आदमी के लिए कठिन काम भी सुगम हो जाता है और अनूत्साही आदमी के लिए सुगम काम भी कठिन हो जाता है।

2 हरेक काम को बड़ी तत्परता और सावधानी के साथ करना चाहिए। थोड़े समयमें होनेवाले काममें अधिक समय नहीं लगाना चाहिए। जो थोड़े समयमें होने वाले काम में अधिक समय लगा देता है उसका पतन हो जाता है।

3 कार्य करनेकी विधिको ठीक तरह से जानना चाहिए। कौन-सा कार्य किस विधिसे करना चाहिए, इसको जानना चाहिए। सोच स्नान खाना पीना उठना बैठना पाठ -पूजा आदि कार्योंकी विधि को ठीक तरह से जानना चाहिए और वैसा ही करना चाहिए।

4 व्यसनोंम में आसक्त नहीं होना चाहिए। जुआ खेलना, मदिरापान, मांस भक्षण वेश्यागमन, शिकार (हत्या) करना, चोरी करना और
परस्त्री गमन यह सात व्यसन तो घोरादीघोर नरकों में ले जानेवाले हैं। इनके शिवाय चाय, कॉफी, अफीम, बीड़ी-सिगरेट आदि पीना और ताश-चौपड़, खेल-तमाशा, सिनेमा देखना, वृथा बकवाद, वृथा चिंतन आदि जो भी पारमार्थिक उन्नतिमें और न्यायमुक्त धन आदि कमानेमें बाधक हैं वे सब-के सब व्यसन हैं। विद्यार्थियों को किसी भी व्यसन के वशीभूत नहीं होना चाहिए।

5 हरेक काम करने में शूरवीरता होनी चाहिए अपनेमें कभी कायरता नहीं लानी चाहिए।

6 जिससे उपकार पाया है उसका मनमें सदा एहसान मानना चाहिए उसका आदर-सत्कार करना चाहिए कभी कृतघ्न नहीं बनना चाहिए।

7 जिसके साथ मित्रता करें, उसको हर हालत में निभाए।

        जैसे मुसाफिर स्वयं धर्मशाला को ढूंढकर उसके पास आते हैं ऐसे ही उपर्युक्त सात गुणोंवाले व्यक्तिको ढूंढकर सिद्धि स्वयं उसके पास आती है।

                                 एक निवेदन
  सर्वसाधारण से नम्रतापूर्वक निवेदन किया जाता है कि यदि उचित समझा जाए तो प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन परमात्मा के और अपने से बड़े जितने लोग घर में हैं उन सब के चरणोंमें प्रणाम करें, हो सके तो बिछौने से उठते ही कर ले, नहीं तो स्नान-पूजा आदी के बाद करें। गुरु, माता, पिता, ताऊ, चाचा, बड़े भाई, ताई, काकी, भौजाई आदि वय, पद और सम्बन्धके भेदसे सभि गुरूञन हैं।
          स्त्री अपने पतिके तथा घरमें अपनेसे सब बड़ी स्त्रियोंके चरणोंमें प्रणाम करें। बड़े पुरुषों को दूरसे प्रणाम करें, घरमें कोई बङे न हो तो स्त्री-पुरुष सभी परमात्माको ही प्रणाम करें।
        इससे धर्मकी वृद्धि होगी, आत्मकल्याणमें बड़ी सहायता मिलेगी परमेश्वर प्रसन्न होंगे। इस सूचना के मिलते ही जो लोग इसके अनुसार कार्य आरंभ कर देंगे उनकी बड़ी कृपा होगी


                   परिवार में सुख शांति कैसे रहे

  जब मनुष्य अपने उद्देश्य को भूल जाता है तभी सब बाधाएं आती हैं। अगर वह अपने उद्देश्य को जागृत रखें कि चाहे जो हो जाए मुझे अपनी आध्यात्मिक उन्नति करनी ही है तो फिर वह  सुख दु:खको नहीं गिनता- 'मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दु:खं न च सुखम्।।' और अपने स्वार्थ एवं अभिमानका त्याग करनेमें सबको कोई कठिनाई भी नहीं होती। स्वार्थ और अभिमानका त्याग होनेसे व्यवहारमें कोई बाधा, अड़चन नहीं आती। व्यवहार में, परस्पर प्रेम होनेमें बाधा तभी आती है जब मनुष्य अपनी मूंछ रखना चाहता है, अपनी बात रखना चाहता है, अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है।

         दूसरे का भला कैसे हो उसका कल्याण कैसे हो, उसका आदर सम्मान कैसे हो, उसको सुख-आराम कैसे मिले यह बात जब आचरणमें आ जाती हैं, तब सब कुटुम्बी प्रसन्न हो जाते हैं। किसी समय कोई कुटुम्बी अप्रशन्न भी हो जाए तो उसकी अप्रसन्नता टिकेगी नहीं, स्थाई नहीं रहेगी। क्योंकि जब कभी वह अपने लिए ठीक विचार करेगा, तब उसकी समझमें आ जाएगा कि मेरा हित इसी बातमें है। जैसे बालककों पढ़ाया जाए तो खेलकूद में वृत्ति रहनेके कारण उसको पढ़ाई बुरी लगती है, पर परिणाममें उसका हित होता है। ऐसे ही कोई बात ठीक होते हुए भी किसीको बुरी लगती है तो
उस समय भले ही उसकी समझ में ना आए, पर भविष्यमें जरूर समझ में आएगी। कदाचित् उसकी समझमें न भी आए तो भी हमें अपनी नियत और आचरण में संतोष होगा कि हम उसका भला चाहते हैं और हमारे भीतर एक बल रहेगा कि हमारी बात सच्ची और ठोस है।
       आपसमें प्रेम रहनेसे परिवारमें सुख-शांति रहती है। प्रेम होता है स्वार्थ और अभिमानके त्याग से जब स्वार्थ और अभिमान नहीं रहेगा, तब प्रेम नहीं होगा तो क्या होगा !
  दूसरा व्यक्ति अपने स्वार्थके वशीभूत होकर हमारे साथ कड़ुवा बर्ताव करता है तो कभी-कभी यह भाव पैदा होता है कि मैं तो इसके साथ अच्छा बर्ताव करता हूं, फिर भी यह प्रसन्न नहीं हो रहा है, मैं क्या करूं ! ऐसा भाव होनेमें हमारी सूक्ष्म सुख-लोलुपता ही कारण है, क्योंकि दूसरे व्यक्तिके तत्काल सुखी, प्रसन्न होनेसे एक सुख मिलता है। अतः इस सुख-लोलुपता का पता लगते ही इसका त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि हमें केवल अपना कर्तव्य निभाना है, दूसरे का आदर करना है, उसके प्रति प्रेम करना है। हमारे भाव और आचरण का उस पर असर पड़ेगा ही।
 हां अंतःकरणमें कठोरता होनेके कारण उसपर असर न भी पड़े तो भी हमने अपनी तरफसे अच्छा किया-इस बातको लेकर हमें संतोष होगा। संतोष होनेसे हमारा प्रेम घटेगा नहीं और परिवार में भी सुख शांति रहेगी।

                           बालक श्रेष्ठ कैसे बने
बालक प्राय: देखकर ही सीखते हैं। इसलिए माता-पिताको चाहिए कि वे उनके सामने अपने आचरण अच्छे रखें, अपना जीवन संयमित और पवित्र रखें। ऐसा करनेसे बालक अच्छी बातें सीखेंगे और श्रेष्ठ बनेंगे।
    बालकोंकी उन्नतिके लिए एक नंबरमें तो माता-पिता अपने आचरण अच्छे रखें और
 दो नंबर में उनको अच्छी बातें सुनाए ऊंचे दर्जेकी शिक्षा दें, भक्तोंके और भगवान् के चरित्र सुनायें। अच्छी शिक्षा वह होती है, जिससे बालक व्यवहारमें परमार्थकी कला सीख जायं ।


मेरा नाम ओमप्रकाश शर्मा है
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